Saturday, June 26, 2021

कहानी : मासूम ज़िद्दी तितली ©विजय शुक्ल बादल

 मासूम ज़िद्दी तितली


शाम की छुटपुट बौछारों के बाद अचानक खिली तेज़ धूप ने उमस बढ़ा दी थी। बारिश से कुछ ही समय पहले गाँव लौटा अभिज्ञान बैठक के कमरे में तेज़ी से चलते पंखे के नीचे भाभी के हाथ से बनी गर्म पकौड़ियों और चाय की चुस्की लेते हुए मन ही मन गर्मी को कोस रहा था! 

तभी अचानक उसने देखा कि एक पीले रंग की तितली शायद उसकी मेज़ पर रखी पीली-पीली पकौड़ियों को फूल समझकर उस पर बैठ गयी। पर पकौड़ियाँ गर्म थी और फूल जैसी तो बिल्कुल नहीं थी, शायद इसीलिए उसका भ्रम टूट गया और वो तेज़ी से कमरे में इधर इधर मँडराने लगी। अभिज्ञान, इस डर से कि कहीं वो मासूम तितली तेज़ी से घूमते पंखे की ज़द में न आ जाए, जल्दी से उठा और पंखे का स्विच ऑफ कर दिया। उसने बैठक के कमरे का बाहर का दरवाजा खोल दिया ताकि कमरे में मँडराती तितली उस दरवाजे से बाहर निकलकर न सिर्फ़ अपनी जान बचा सके बल्कि अपने सच्चे साथी रसभरे वास्तविक फूल तक पहुंच सके। पर तितली तो जैसे खुद को नासमझ सिद्ध करने की ज़िद पर अड़ी थी, कमरे की खिड़की के शीशे पर जाकर बैठ गयी। अभिज्ञान ने पहले सोचा कि अपनी उंगलियों से पकड़कर उसे उसकी मंज़िल तक पहुँचा दे पर फिर अपनी सख़्त उंगलियों और तितली के नाज़ुक पंखों का ख़्याल आते ही वो सहम उठा। उसने एक कपड़े से उस तितली को खिड़की से उड़ाकर खुले दरवाजे की तरफ ले जाने की कोशिश की। तितली उड़ी और पूरे कमरे में इधर उधर चक्कर लगाकर नीचे फर्श पर आकर बैठ गयी। 

पंखा बंद होने के कारण गर्मी बहुत बढ़ गयी थी। अभिज्ञान भी पसीने से लगभग तर हो चुका था। पर उसने भी हार नहीं मानी थी। उसने एक कागज का टुकड़ा फर्श पर तितली के पास रखा और धीरे धीरे तितली के नीचे सरकाता चला गया तितली को भी शायद कागज़ पर आने में कोई समस्या न हुई। तितली के कागज़ पर आते ही अभिज्ञान ने धीरे से कागज़ उठाया और खुले हुए दरवाजे से तितली को खुले आसमान की ओर उछाल दिया। तितली भी अपने खूबसूरत पीले चित्तीदार पंखों से कलाबाजियां करती हुई उड़ने लगी। पर यह क्या! इधर-उधर उड़कर तितली खुले दरवाजे से फिर से कमरे में रखी ठंडी हो चुकी पकौड़ियों पर जाकर बैठ गयी थी। अभिज्ञान उस मासूम तितली के इस अप्रत्याशित कृत्य से हतप्रभ अपनी कुर्सी पर आकर बैठ गया। छत में लगा पंखा तेज़ी से दौड़ रहा था और सिर पर मंडराते इस ख़तरे से बेख़बर मासूम तितली न जाने पकौड़ियों को फूल समझ रही थी, या अपनी मूल प्रवृति से इतर पकौड़ियों को ही तरज़ीह दे रही थी। अभिज्ञान के दिल की धड़कने अचानक तेज़ हो गयीं, उसका चेहरा लटक गया। दरअसल इस मासूम तितली का यह बर्ताव उसे अंजलि की याद दिला गया था! अभिज्ञान ने ख़ुद को जैसे-तैसे सहज कर मन की बेचैनी काबू करते हुए पकौड़ियों की प्लेट हाथ में ले ली और सोचा ये प्लेट ही जाकर बाहर रख देगा। अंजलि के ख़्यालों में खोया अभिज्ञान पकौड़ियों की प्लेट बाहर रख आया था पर उसने बाद में ध्यान दिया कि वह मासूम तितली तेज़ी से चलते पंखे के नीचे बेपरवाही से परवाज़ भरे जा रही थी। गर्मी इतनी ज्यादा थी कि नादान तितली के लिए पंखा बंद करने का ख़याल भी अब अभिज्ञान को नादानी ही लगी। तितली को बचाने की तमाम नाकाम कोशिशों से आजिज़ आकर अभिज्ञान ने तय किया कि वह किसी की ज़िंदगी और मौत में कोई हस्तक्षेप करने की स्थिति में नहीं। जो ईश्वर की इच्छा होगी, वही होगा। अपने में ही खोया अभिज्ञान यही सोचकर ऊपर अपने कमरे में चला गया। रात भर तितली और अंजलि के सपनों ने उसे बेचैन रखा। सुबह आंख खुली तो अभिज्ञान को तितली का ख्याल आया। वो तेज़ी से नीचे बैठक के कमरे की ओर भागा। जल्दबाज़ी में जाने कैसे उसका पैर फिसला फिर उसके बाद क्या हुआ उसे ख़बर नहीं। जब उसकी आंख खुली तो दीवार घड़ी 9:25 बजा रही थी। घर के सब लोग उसे घेर कर बैठे थे। माँ ने पूछा, "अभिज्ञान ये सब क्या है, ये कैसी हालत बना रखी है, हुआ क्या है तुम्हें? बेहोश कैसे हो गए थे तुम"

"माँ वो तितली कहाँ है, कैसी है? वो उड़ गई क्या?" अभिज्ञान ने पूछा। 

"इस हालत में तुम उसकी फ़िक्र में हो और वो मासूम ज़िद्दी तितली भी अभी तक रोशनदान की जाली पर बैठी है,  मानों तुम्हारे ही इंतज़ार में..." अभिज्ञान ने गौर से देखा, उसे रोशनदान पर वो मासूम और ज़िद्दी तितली की जगह अंजलि ही दिख रही थी। एक गहरी साँस भरकर उसने आँखे बंद कर ली और दो नन्हीं बूंदें आँखों की कोर से ढुलककर तकिये में समां गयीं!

©विजय शुक्ल बादल


Wednesday, February 26, 2020

दिल्ली हिंसा के कारण व अमन और शांति हेतु उपाय

नफ़रतें जब भी बढ़ीं बरबाद सब कुछ कर गयी हैं,
इसलिए पहुँचायें, आओ मिलके पैग़ाम-ए-मोहब्बत!
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दिल्ली में जो हो रहा है, वह सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों के बेलगाम लोगों के द्वारा की जाने वाली अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण और निंदनीय राजनीति का परिणाम है! मेरा स्पष्ट रूप से मानना है कि इस समय प्रत्येक भारतीय को हिंदू मुस्लिम  के दृष्टिकोण से ऊपर उठकर मानव होने के नाते मानवता के पक्ष में खड़ा होना चुनना चाहिए और इस समय मानवता की मांग ये है कि किसी भी राजनेता के किसी भी बयान को बहुत ही ध्यान से सुने और अगर उसमें संकुचित राजनीतिक सरोकारों की बू आए तो उसमें मानवीय विवेक का उपयोग कर स्वयं सुनिश्चित करें कि आप कहीं किसी राजनीतिक खेल का हिस्सा तो नहीं बनने जा रहे! ज़रा सोचिए, कहीं आप किसी के हाथ की कठपुतली तो नहीं बन रहे हैं? मेरा ऐसा कहने के पीछे कुछ कारण है! सबसे पहले जो कारण मैं आपके साथ साझा करना चाहता हूँ, वह यह है कि सी ए ए के विरोध में 70 से अधिक दिनों से हज़ारों महिलाएं अपने छोटे-छोटे बच्चों के साथ पूरी सर्दियाँ सड़क पर काट देती हैं और यह विरोध एक ऐसे कानून के लिए है जिससे भारतीय महिलाएं या भारतीय मुसलमान ही क्या, कोई भी इकलौता भारतीय नागरिक प्रभावित होने वाला नहीं है! यह बात सी ए ए का ड्राफ्ट भी कहता है और स्वयं भारत के प्रधानमंत्री भी इस बात को तीन बार दोहरा चुके हैं! सी ए ए पर प्रधानमंत्री के स्पष्टीकरण के बयानों को सुनने के बावजूद आज भी शाहीन बाग में हजारों की संख्या में महिलाएं उपस्थित ही नहीं है, पुरजोर ढंग से सीए के विरोध में अपनी आवाज बुलंद करती भी देखी जा सकती हैं! जारी हुए वीडिओज़ यह दिखाते हैं कि सी ए ए का विरोध करती हुई तमाम महिलाओं में से अधिकांश को तो चंद स्वार्थीजनों के द्वारा दी गयी जानकारी के सिवा सी ए ए की सामान्य जानकारी भी नहीं है? फिर घर परिवार की जिम्मेदारियाँ दरकिनार कर इतनी बड़ी संख्या में महिलाएं कैसे शाहीन बाग में अपनी मांग मनवाने के लिए इस शिद्दत से अड़ सकती हैं? स्पष्ट है घर की प्रतिदिन की ज़रूरतों की कीमत पर मुस्लिम पुरुषों ने उन्हें अनुमति दे रखी है! अब सवाल यह है कि भारतीय मुस्लिम जनों को बिल्कुल भी प्रभावित न करने वाले सी ए ए का ऐसा कौन सा डर दिखाया गया है कि वह आज सरकार के समक्ष शक्तिप्रदर्शन को मज़बूर हैं?
एक दूसरा दृश्य यह भी है कि जहां एक तरफ सी ए ए के विरोध में पूरे देश में कई शाहीनबाग बन चुके हैं, हजारों की तादाद में महिलाएं बच्चे सीए का विरोध करते देखे जा सकते हैं, वही दूसरी ओर सी ए ए के समर्थन में भी पूरे देश आयोजित सैकड़ों रैलियों में हजारों की तादाद में लोग सीएएए का समर्थन भी करते नजर आ रहे हैं! सीए के समर्थन में की जाने वाली इन रैलियों में मीडिया पर जारी वीडिओज़ के माध्यम से कुछ ऐसे लोग भी देखे गए जिन्हें सी ए ए का फुल फॉर्म भी नहीं पता था!  अब जिस बुनियादी प्रश्न  की ओर आपका ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं वह यह है कि कौन है जो रोज़ी रोटी की ज़द्दोज़हद में लगे भारत के हज़ारों गरीबों और बेरोजगारों को ज़रूरत की जंग छोड़कर सड़कों पर भीड़ का हिस्सा बनने को विवश कर रहा है? यहाँ यह भी स्पष्ट कर दूँ कि भारत के सम्मानित नागरिक होने के नाते हमें यह पूरा अधिकार है कि हम सरकार द्वारा लाए गए किसी कानून का समर्थन करें या उसका शांतिपूर्ण ढंग से विरोध! किंतु मात्र कुछ लोगों के आवाहन पर किसी कानून को बिना जाने, बिना समझे उसके विरोध अथवा समर्थन के प्रदर्शन कार्यक्रमों में प्रतिभाग करने से पूर्व यह विचार आवश्यक है कि कहीं हम बरसों से भारत की पहचान रही हिंदू-मुस्लिम एकता, आपसी भाईचारा और अमन को खत्म करने की ओछी सियासत का हिस्सा तो नहीं बनने जा रहे?
उक्त मन्तव्य को सुदृढ सिद्ध करने के उद्देश्य से अब मैं एक तथ्य साभार Dhruv Gupt सर की फेसबुक पोस्ट से यहाँ प्रस्तुत करना चाहूँगा! उन्होंने कहा कि अगर हम राजनीति के क्षेत्र के धुर-विरोधी नेताओं को सभी सुविधाओं से युक्त एक बड़े कमरे में बंद कर दें और 24 घंटे बाद हम पाएंगे कि वह आपस में मिलजुल कर के एक दूसरे से हंसी ठिठोली करते हुए जाम से जाम टकराते हुए बिरयानी साझा कर रहे होंगे! दूसरी ओर, कल्पना कीजिए, इन्हीं धुर विरोधी राजनेताओं के समर्थकों को 24 घंटों के लिए एक बड़े हॉल में बंद कर दिया जाए तो क्या क्या परिणाम हो सकते हैं? सम्भव है बात आपसी बहस से शुरू होकर सिरफुटौव्वल से होकर कुछ एक की जान लेकर भी ख़त्म न हो!
ये पक्ष विपक्ष के समर्थकों में इतनी कटुता क्यों है? कौन भर रहा है ये नफ़रत का ज़हर हमारी नसों में? देश का दुर्भाग्य यह है कि भारत के राजनेताओं को हर घटना-दुर्घटना में राजनीतिक अवसर के सिवा और कुछ नज़र ही नहीं आता! मीडिया भी अपनी  खबरों वीडियो फुटेज के ज़रिए आग में तेल डालने जैसे चरित्र के सिवा कुछ और प्रदर्शित करता नहीं दिखता! ख़ैर राजनीति करना राजनेताओं  का अधिकार है वो शौक़ से राजनीति करें! टीआरपी बढ़ाने जैसी हर ख़बर दिनभर चैनलों पर चलाकर व्यवसाय करना मीडिया का अधिकार है वो अपना कार्य बदस्तूर जारी रखने को स्वतंत्र है! किन्तु हे भारत के सम्मानित नागरिक, आप से हाथ जोड़कर मात्र इतनी सी अपील है कि आप किसी शांतिपूर्ण समर्थन/विरोध प्रदर्शन अथवा किसी भी गतिविधि का हिस्सा बनते समय यह अवश्य सोच-विचार कर लें कि क्या आप स्वयं अपनी इच्छा से ऐसा करना चाहते हैं? अब हर सच्चे देशभक्त को अपने मर्यादित आचरण से यह स्पष्ट संदेश देना ही होगा है कि देश के सौहार्द और अमन को क्षति पहुँचाने वाली अथवा देशहित को दरकिनारकर  संकुचित स्वार्थ से सनी कोई भी राजनीति देश में अगर की जाएगी तो आम भारतीय उसका हिस्सा नहीं बनेगा!

इतनी दुआ क़ुबूल हो मेरी मेरे मालिक,
चैन-ओ-अमन शहर में हमेशा बना रहे!
©विजयशुक्लबादल
#BigNo2NarrowPolitics
#IndiaForPeaceAndBrotherhood
#delhi_voilence
चित्र India today की website से साभार

Saturday, September 14, 2019

#हिंदी दिवस

हिंदी की वर्तमान स्थिति पर गंभीरता से विचार रखते हुए कई विद्वान रचनाकार 14 सितंबर के दिन "हिंदी दिवस" मनाने को हिंदी की दयनीय स्थिति और हिंदी वालों की विवशता मानकर चिन्तित दिखाई देते हैं, वहीं मैं हिंदी की वर्तमान स्थिति व इसकी उन्नति- प्रगति को लेकर पूर्ण आश्वस्त हूँ! इस आश्वस्ति का कारण यह है कि परिवर्तनशील परिदृश्य में हिंदी ने वर्तमान आवश्यकता का अनुभव कर अनेक भाषाओं के अनेकानेक प्रचलित शब्दों को अत्यंत सहजता से आत्मसात करने में उल्लेखनीय सफलता अर्जित की है। अन्तर्राष्ट्रीय भाषा के नाम से पुकारी जाने वाली "अंग्रेज़ी" भाषा संभवतः अन्य भाषाओं के अतिप्रचलित शब्दों को बिना किसी संकोच के आत्मसात कर स्वयं के शब्दकोश को विस्तारित करने की अपनी अनुपम विशेषता के फलस्वरूप ही उक्त गौरव प्राप्त कर सकी। हिंदी भी मुझे इसी प्रगतिपथ पर अग्रसर दिखाई देती है! हिंदी दिवस की शुभकामना व बधाई देते हुए अगणित हिन्दीपुत्र/ पुत्रियों की रचनाएँ विभिन्न सोशल मीडिया पटलों पर देखिये तो सही, उनमें बड़ी सहजता से अन्य भाषाओं यथा उर्दू, अरबी, फारसी, नेपाली, और अंग्रेज़ी के भी शब्दों का सहज प्रयोग किया गया है! हिंदी के प्रचार- प्रसार और विकास के लिए यह अत्यंत आवश्यक और सुखद संकेत प्रतीत होता है। अनेकानेक भाषाओं और बोलियों के प्रचलित शब्दों का समावेश करते हुए हिंदी शनैः शनैः अपना आँचल विस्तृत करती जा रही है और वह दिन अधिक दूर नहीं जब मात्र भारतवर्ष ही नहीं, समूचा विश्व हिंदी की आवश्यकता और इसकी विहंगमता को स्वीकार करने को विवश होगा!
यहाँ यह उल्लेखनीय है कि मात्र कौतूहल उत्पन्न करने हेतु अथवा प्रदर्शन के उद्देश्य से बिना विचारे अन्य भाषा के शब्दों का दुरुपयोग हिंदी की उन्नति के परिप्रेक्ष्य में कुछेक आशंकायें भी उत्पन्न करता है! इसलिए, यह आवश्यक है कि हिंदी के विहंगम शब्दकोश में उचित विमर्श के पश्चात ही अन्य भाषाओं के आवश्यक शब्दों का समावेश हो! किन्तु समय के साथ- साथ यह समावेश अनिवार्य भी है, ऐसा इसलिए कि किसी भाषा की उन्नति-प्रगति हेतु उसके शब्दकोष में यथोचित सामयिक संवर्धन अत्यंत आवश्यक है। इस प्रकार के समावेश का एक प्रभाव यह भी हो रहा है कि अपनी भाषा के शब्दों को हिंदी में देखकर अन्यभाषाभाषी भी हिंदी के प्रयोग की ओर अग्रसर हो रहे हैं, मुझे लगता है यह सुखद शुभारंभ है! भाषा की उन्नति और प्रसार मात्र व्याकरणसम्मत लेखन- पठन से नहीं अपितु उसकी ग्राह्यता के संवर्धन से ही संभव है!😊
सभी स्नेहीजनों को हिंदी दिवस की अनेकशः शुभकामनाएँ!😊💐💐

माँ हिंदी की उपलब्धियों पर उसका गर्वित पुत्र
विजय शुक्ल बादल
जय हिंदी; जय भारत!🇮🇳🇮🇳
#हिंदी_दिवस

Friday, September 1, 2017

एक मुक्तक

क़फ़स में कबसे इक परिंदा है!
जाने किस बात पे शर्मिंदा है?
वो जो इंसाँ था मर गया कल शब,
वो जो नेता है वही ज़िंदा है।।

नेताओ और बाबाओं से छुटकारे का फौरी समाधान

मुझे तो लगता है कि कम से कम भारत के इन कथित नेताओं और बाबाओ को एक बड़े से, सारी सुख-सुविधाओं से युक्त पानी के जहाज़ में भरकर हमेशा के लिए बीच समंदर छोड़ देना चाहिए! देश को ख़ुद के मनहूस साये से आज़ाद करने के बदले में इन नेताओं के लिए आजीवन इतनी सुविधाएं तो बनती ही हैं। देश का नेतृत्व प्रखर बुद्धि वाले कर्मठ ईमानदार युवाओं को मिले...जाति, धर्म, भाषा जैसे वर्तमान संकुचित धारणाओं से निकल कर राजनीति समस्त प्राकृतिक एवं मानवीय संसाधनों के समुचित सदुपयोग पर केंद्रित हो। ईमानदार युवाओं द्धारा, ईमानदारों के लिए बेईमानों पर शासन!

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न्रिशंसता; लखीमपुर युवक ने बच्ची कलाई काट डाली...

काटकर कमसिन कलाई, क़त्ल कर क़िरदार का,
रूप धर नर का, नशे मे घूमते हैं नरपिशाच...!
~विजय शुक्ल बादल
 
कैसे कुछ बोले गूंगों की बस्ती है,
और बहरे सरकार चलाने वाले हैं!
मनमाने मुसिफ़, फ़रियादी बेबस हैं,
न्याय का शव क्षत-विक्षत, सच पर ताले हैं!!


अंधभक्त...बाबा के दर पर

आज युवाओं में धर्म के नाम पर फैले आडम्बर के प्रति कहीं ज़्यादा गुस्से की ज़रूरत है...कुछ तो करना होगा! पर नई पीढ़ी अपना कीमती गुस्सा सोशल मीडिया पर बाबाओं को अपशब्द कहने और धर्मभीरु श्रद्धालुओं की कटु एवं कभी कभी अभद्र आलोचना करने में ज़ाया करती नज़र आ रही है। नई पीढ़ी वही कर रही है जैसी उसकी कंडीशनिंग की गई है...चन्द चतुर सुजान किंतु स्वार्थी लोगों द्वारा ऐसा कर के दिखाया गया और हमारे युवा आक्रोशव्यक्त करने के इसी तरीक़े को ले उड़े! ज़रूरत है इस गुस्से का सदुपयोग करने की ताकि केवल शोर न हो, कुछ संदेश पहुँचे! पर दुर्भाग्यपूर्ण है, नई पीढ़ी के युवाओं को सोशल मीडिया के दुरुपयोग के उथले तात्कालिक लाभों के आगे दूरगामी ख़तरे नज़र नही आ रहे! यहाँ तो जैसे हर कोई अपना नया झंडा गढ़ने की जुगत में है; सोशल मीडिया झंडा ऊंचा करने वालों का जमावड़ा भर बनकर रह गया है! झंडे बदलते रहते हैं बस..! सोशल मीडिया की ताक़त का सदुपयोग करने का ज़िम्मा चंद लोग ही सम्हाले नज़र आते हैं, ..ऐसे में हर युवा का कर्तव्य है कि हम समय जितना भी दे सकें, उन चंद लोगों में शामिल होने की कोशिश रहे!
और हाँ, एक बात और! मुझे लगता है कि हमारा काम है कि दूसरों का जो व्यवहार हमें उचित न लगे, वो व्यवहार से हम स्वयं को विलग रखें और सदैव उचित व्यवहारयुक्त आचरण ही करें! आवश्यकता पड़ने पर अपनी बात संसदीय भाषा मे ही सामने वाले के समक्ष रखें! आचरण की पवित्रता से समृद्ध, स्नेह व सद्भावयुक्त बात धीरे से भी कह दी जाए तो अंगुलिमानों को भी संत बनाने की क्षमता रखती है...कुत्सित बुद्धि और आचरण करने वालों के मुख से निकले कथित धार्मिक विचार धर्म के भी नाम पर लोगों को उपद्रवी ही बनाते दिखते आये है! अतएव कथनी को करनी का समर्थन अवश्य चाहिए अन्यथा अत्यंत सुंदर व आध्यात्मिक सद्विचारों वाले संत भी आसाराम जैसे पतित ही सिद्ध होते रहेंगे..!

Sunday, June 4, 2017

ग़ज़ल- जब तलक उल्फत न थी...

https://www.youtube.com/watch?v=ys2-M8HaCVE
जब तलक़ उल्फ़त न थी क्या दर्द है जाना न था!
मेरे हांथों में कलम रहता था पैमाना न था!!

अब गले पड़ता है तो फिर होते हो नाशाद क्यों,
यूँ था तो फिर शेख़ जी ऊँगली को पकड़ाना न था!!

या तो करनी ही न थी तुझको मोहब्बत या तो फिर,
ओखली में देके सर चोटों से घबराना न था!!

मेहरबान वो हो गया होता बस इतनी शर्त थी,
हाँ-हुजूरी करनी थी सच उसको बतलाना न था!!

उसको पाने की तड़प दैर-ओ-हरम तक ले गयी,
दिल में ही बसता है वो दिल का सुकूँ माना न था!!

दोस्तों उल्फत में वो था चाहता मेरा ज़मीर,
पास मेरे जाँ से बेहतर कोई नज़राना न था!!

कितने है जो प्यार से मरहम लगायेंगे बता,
अंजुमन में हर किसी को ज़ख्म दिखलाना न था!!

आँखों के "बादल" बरस ही जाने थे लेकिन मुझे,
आँसुओं की आंच से पत्थर को पिघलाना न था!!

-विजय शुक्ल बादल



Friday, March 10, 2017

ग़ज़ल- प्रश्न है तो है हल समझेंगे


प्रश्न है तो है हल, समझेंगे।
आज नहीं तो कल समझेंगे।।

हिन्दू मुस्लिम सिक्ख ईसाई,
राजनीति का छल समझेंगे।।

भाई अक्सर क्यों लड़ते हम,
बैठ ज़रा दो पल, समझेंगे।।

आ चल! गंगातट चलते हैं,
क्या है गंगाजल, समझेंगे।।

क्या हम कलयुग के रावण से,
सीता का आँचल समझेंगे?

आओ आज को जी भर जी लें,
कल जो होगा,  कल समझेंगे।।

कब साहिल पर बैठने वाले,
सागर की हलचल समझेंगे!?










Wednesday, March 8, 2017

चैन-ओ-अमन शहर में हमेशा बना रहे!!!

लखीमपुर में कर्फ्यू के हालात पर सभी हिन्दू मुस्लिम भाई-बहनों के भले के लिए अपने इष्ट से एक प्रार्थना- सभी सम्मानित गुरुजनों, अग्रजों और सभी बुद्धिजीवी साथियों को प्रणाम करते हुए!!!


अच्छा-बुरा है, मेरा है, मेरा बना रहे।
बरसों से जो क़ायम है भरोसा बना रहे।।

दीवार मज़हबी न खड़ी हो कोई यहाँ,
है प्यार जो दिलों के दरमियाँ बना रहे।।

हिन्दू बने, मुस्लिम बने, सिख या की ईसाई,
पर सबसे है बेहतर कि तू इन्सां बना रहे।।

दुनिया को दिखा पाये जो तस्वीर-ए-हक़ीक़त,
हर एक सुख़नवर वो आईना बना रहे।।

इतनी दुआ क़ुबूल हो मेरी मेरे मालिक,
चैन-ओ-अमन शहर में हमेशा बना रहे।।

पैग़ाम-ए-मोहब्बत; वक़्त की ज़रूरत

नफ़रतें जब भी बढ़ी बर्बाद सब कुछ कर गयी है,
इसलिए पहुंचाएं आओ मिल के पैगाम-ए-मोहब्बत...

Monday, March 6, 2017

कहानी-कर्फ्यू

“कर्फ्यू”

क्या! कर्फ्यू लग गया!! लखीमपुर खीरी में!!! वो शहर जो पूरे उत्तर प्रदेश में भाईचारे और अमनपसंदगी के लिए जाना जाता है, उस शहर में कर्फ्यू!!! टीवी स्क्रीन पर ये ख़बर देखकर भी यकीन नहीं हुआ तो ख़बर की सच्चाई पता करने के लिए चन्दर सड़क पर निकल आया! बाजार बंद, शटर गिरे हुए!! कुछ एक लोग इधर उधर बातचीत करते हुए नज़र आ रहे हैं। मोहल्ले के नुक्कड़ पर बारह तेरह लोग खड़े हैं। चन्दर माहौल का अंदाज़ा लगाने के लिए सड़क पर खड़े लोगों की बाते सुनने लगा। शहर के प्रमुख महाविद्यालय के प्रवक्ता सूरजभान श्रीवास्तव जी, एक सम्मानित व्यक्ति हैं शहर के, बोल रहे थे, "नहीं-नहीं ये ठीक नहीं है कि कोई ट्वेल्थ क्लास का लड़का कोई मूर्खता करे और हम समझदार लोग प्रतिक्रिया स्वरुप बड़ी मूर्खता करें और शहर का माहौल बिगाड़ दें। हमें लखीमपुर का माहौल बिगाड़ने वालों का साथ नहीं देना चाहिए चाहे वो किसी मज़हब के हों...चंद सिरफिरों के कारण सभी मुसलमान भाईयों को गुनहगार मान लेना कहाँ की समझदारी है...” बीच में ही बात को काटते हुए लाला बोल उठा, " तो सारी समझदारी का ठेका हम हिन्दुओं ने ही ले रखा है सर! क्या हिन्दू अपना...अपने देवी देवताओं का अपमान करने वाले को यूँ ही छोड़ दें! माफ़ कीजिये हम से अब और ये न हो सकेगा। वो उनके पैग़म्बर मोहम्मद साहब के ऊपर हुई ग़लत टिप्पड़ी पर इतना बवाल मचा देते हैं| क्या हमारे देवी देवताओं का अपमान, अपमान नहीं? उस लड़के को छोड़ा गया तो अच्छा नहीं होगा सर! अरे रोहन! बता न सर को, उस सूअर ने उस वीडियो मे जो कुछ कहा है वो सुनकर तो सर आप से भी न रहा जायेगा।" लाला के ऐसे तेवर तो सूरजभान जी ने कभी न देखे थे | माहौल को समझकर सभी को सम्बोधित करते हुए बोले, ‘देखिये पहले तो ऐसे किसी वीडियो की बात ही न हो अब, इससे हमारा...हमारे देवी देवताओं का सम्मान बढ़ थोड़े ही जायेगा! और लाला! ये कैसी भाषा सीख ली है तुमने? मेरे सामने भी...” लाला सूरजभान जी का बहुत सम्मान करता था उन्होंने उसे न सिर्फ पढाया था बल्कि समय समय पर उसका मार्गदर्शन भी करते रहते थे|
लाला वैसे तो मोहल्ले में एक मिलनसार लड़का माना जाता है, हर किसी के काम पर हर वक़्त हाज़िर...बस एक फ़ोन करने कि देरी है| पर इधर कुछ सालों से जबसे लाला पर राजनीति का बुखार चढ़ा है तब से स्वभाव में तैश कुछ ज्यादा ही रहने लगा है...खैर! चंदर चुपचाप सारी बातें सुन कर माहौल को समझने की कोशिश कर रहा था| तभी नंदू चाचा, नुक्कड़ पर चाय का ठेला लगाते हैं, बोल उठे, “ यो ससुर लखीमपुर मा त कबहूँ अइसा न भवा! हियाँ के नेता बढ़िया हइं, कुछु काम त न करत, तबहूं बढ़िया हइं, कबहूँ लखीमपुर का माहौल तउ न बिगाड़ा! पर अब इधर कछु ढाई तीन सालन ते याक अजब किसम केरी राजनीती शुरू भई है जो, हियाँ के माहौल का बिगाड़े धरे दे रही है... कछु नए नए नेता का उभर रहे हैं दुनहू पच्छन मा... ये इ सब बिगड़े माहौल का और बिगाड़े की कोसिस करि रहे हैं येहिमा इनका का जाने का लाभ है...अब अगर हम सब मिलि-जुलि के रहि रहे हैं तौ ये इनका हज़म न हुई रहा. अब काम धंधा सब चौपट दुई चार दिन की खातिर...”
तभी मोहल्ले के एक वकील साहब, आज सुबह सुबह ही थोड़ी लगा लिए थे शायद...घर का गेट खोलकर निकले और सीधे पब्लिक से रूबरू हुए, ‘ अरे भाई बात सिर्फ इत्ती सी है कि बात कुच्छ नहीं है...ही ही ही! और लाला सुनो! ऐसे समझो कि एक चूतिये ने एक चूतियापा किया, चन्द चूतियों ने दूसरा और सबसे बड़ा चुतियापा शहर में कर्फ्यू लगा दिया गया! हा हा हा...’ “अरे वकील साहब तो आपको यहाँ आकर अपना चूतियापा सिद्ध करने का किसने निमंत्रण दिया है? बोलने कि तमीज़ नहीं है तो क्यों बोलते हैं आप? आप तो अपने घर ही जाओ...खुद सही से चला नही जा रहा और चले आये हैं हमे चलना सिखाने...” लाला कि त्योरियां चढ़ी देखकर चार पांच लड़के वकील साहब को उठाकर बइज्ज़त उन्हें उनके गेट के अन्दर रख आये| वकील साहब... कुछ पता नहीं क्या बडबडाते जा रहे थे, ‘अरे अरे! रुको, सुनो तो भाई, जरा ठहरो तो...
वकील साहब कि हरकत से लाला का मूड और ख़राब सा हो गया, “ अब और नहीं सहेंगे सर! अब फैसला होकर रहेगा!” पर सूरजभान जी बात को भांप न सके, ज़रा जोर से बोले, ‘क्या फैसला होकर रहेगा लाला? तुम भी! और ये वकील साहब! सुबह से ही शराब...हद है, नशे में कुछ भी बोल देते है! इनको तो पागल समझो...” लाला अब तैश में आ चुका था, “ किस किस को पागल समझें सर, लोकतंत्र का मतलब ये है क्या कि कोई कुछ भी बोल देगा यहाँ...मन चाहे जिसको जो गाली दो; कि तुम्हे अभिव्यक्ति कि स्वतंत्रता है! सर अपने यहाँ पागलों के दो ही इलाज़ होते हैं या तो उन्हें पागलखाने भेज दिया जाता है और अगर समाज को उनसे खतरा हो तो सीधे उपर वाले के पास...” गहमागहमी के माहौल का अहसास कर सूरजभान जी थोडा नरमी से काम लेते हुए बोले, ”देखो लाला! मै किसी भी संविधानेतर गतिविधि का कभी समर्थन नहीं कर सकता. वो लड़का तो पहले से ही गिरफ्तार किया जा चुका है, पुलिस ने भी उचित धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज करने का आश्वासन देकर उसे सीधे जेल भेज दिया है... बाकी उस पक्ष में भी सब शांत हैं अब, तो तुम लोग क्यूँ माहौल को ख़राब करना चाहते हो? अब तो जैसे लगता है कि तुम...तुम्हारे जैसे युवाओं के इसी उत्तेजक रवैये का नतीजा है कि शहर में एक अनिश्चितता का सा माहौल बना हुआ है|” “अच्छा, सारा माहौल तो हमने बिगाड़ा है सर! वो लोग तो साधू सन्यासी हैं न! वो कुछ भी कहें, कुछ भी करें और हम अगर अपने धर्म, अपने आत्मसम्मान की रक्षा के लिए आवाज़ उठाये तो हम गलत हैं, साम्प्रदायिक हैं? ये कैसा धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र है जहाँ हिन्दुओं के लिए धार्मिक समानता के अधिकार की बात करना साम्प्रदायिक हो जाता है? ऐसी धर्मं निरपेक्षता हमें रास नहीं आती सर! हम धार्मिक हैं, हमें अपना धर्म जान से भी प्यारा है!” कई लड़के एक साथ चिल्लाये, ‘लाला भैया सही कह रहे है सर! हर हर महादेव, जय महाकाल!!! “
इस सब शोर शराबे की बातचीत के कारण चालीस-पचास लोग इकट्ठे हो गए| सूरजभान जी समझ नहीं पा रहे थे कि क्या कहा जाये! कैसे समझाया जाये भीड़ को! भीड़ स्वाभाव से ही उग्र होती है| पढ़े लिखे समझदार लोग तक भीड़ का हिस्सा बनकर अक्सर भेड़ों जैसा और कभी कभी भेड़ियों जैसा व्यव्हार कर बैठते है! पर जनहित में लोगों को इंसान बने रहना ही होगा| ये समझना ही होगा कि हालात अगर कहीं बेकाबू हुए तो नुकसान सबका है! सवाल ये नहीं कि नुकसान किसका कम या ज्यादा होगा...दंगो का इतिहास है कि नुकसान चाहे हिन्दू का ज़्यादा हो या मुसलमान का, सबसे ज्यादा नुकसान इंसानियत का हुआ है| सूरजभान जी इसी चिंता में कुछ सोच न सके! हलक जैसे सूख सी गयी हो! उनका चिंताग्रस्त चेहरा देखकर अब चंदर से न रहा गया! बोल पड़ा, “ अगर आप लोगो की इजाज़त हो तो मैं कुछ कहना चाहता हूँ?” दर्शनशास्त्र का विद्यार्थी चन्दर मोहल्ले में अपनी ख़ामोशी के लिए जाना जाता था...अपने काम से काम...लिखने पढने का अभ्यस्त चंदर यूँ तो मोहल्ले की किसी गतिविधि से अधिकतर दूर ही रहता था| पर लाला वो सत्संग वाले दिन से उसकी बड़ी इज्ज़त करने लगा था| उस दिन चंदर धर्मं और राजनीती के जुड़ाव पर बोला था| लाला को ध्यान आया, उस दिन चंदर ने कहा था, ”राजनीति के साथ अगर धर्मं हो जाये तो देश का विकास होता है, परन्तु यदि धर्म के साथ राजनीति हो जाये तो सर्वनाश होता है...” इधर सारी घटनाक्रम से सशंकित सूरजभान सर उसे मना कर रहे हैं कि वहां का माहौल कही और न बिगड़ जाये ! पर चंदर है कि बोलना चाहता है, बड़ी सहजता से...एक सच्ची मगर सावधान मुस्कान के साथ चन्दन कहने लगा “देखिये माहौल को बनाना है तो किसी एक पक्ष को समझदारी दिखानी होती है...जिन शहरों में ऐसा नहीं होता, वहाँ आए दिन माहौल बिगड़ता रहता है, कर्फ्यू लगते रहते हैं| पश्चिमी उत्तर प्रदेश का हाल किसी से छिपा नहीं है! सही कह रहे थे नंदू चाचा, कुछ सालों से कुछ कथित धार्मिक गतिविधियाँ बढ़ी हैं अपने शहर में! अगर बारीकी से पूरे घटनाक्रम का विश्लेषण करेंगे तो पाएंगे कि उन्ही बढ़ी गतिविधियों का परिणाम है ये वीडियो...! देखिये...हम सब मानते हैं कि धर्मं श्रद्धा का विषय है...!’ चंदर बोले जा रहा था, “श्रद्धा एक नितांत व्यग्तिगत भाव है अपने इष्ट के प्रति, इसके प्रदर्शन की क्या आवश्यकता? फिर मुझे ये समझ नहीं आता कि क्यूँ हिन्दू बुद्धिजीवी जो मुसलमानों के जुलूसों, सड़क पर नमाज़ का जन-असुविधा के नाम पर एक तरफ तो बड़ी आलोचना करते हैं, पर दूसरी तरफ, हनुमान-यात्रा और महाशिवरात्रि जैसे त्योहारों पर वैसे ही बड़े धार्मिक आयोजनों का बढचढ कर समर्थन करते दिखते हैं...देखिये धर्मं आस्था का विषय है, होड़ का नहीं! पर हम होड़ करने में लगे हैं! होड़ कि किसके त्यौहार पर शहर ज्यादा जगमगाएगा! किसके त्यौहार पर कितना भव्य आयोजन होगा! कितने ज्यादा लोग इकट्ठे हों सकेंगे...कभी कभी ये धर्मं कम, एक बड़े सफल धार्मिक गतिविधि का आयोजन कर शक्तिप्रदर्शन करने जैसा अधिक लगता है...जो अगली बार दूसरे पक्ष के एक और बड़े धार्मिक आयोजन के रूप में परिणत दिखाई देता है! जिस पक्ष का आयोजन कमतर रह जाये वो कुंठा में प्रतिक्रिया स्वरुप कुछ भी ऐसी उल-जुलूल हरकते तक कर बैठता है कि सौहार्द का वातावरण तक विषाक्त हो उठे...ये मेरे व्यक्तिगत विचार हैं...मैं तो आप सबसे हाथ जोड़कर यही अपील करूँगा कि धर्मं व्यक्तिगत श्रद्धा का विषय है प्रदर्शन से इसका कोई लेना देना नहीं! फिर भी जो भी व्यक्ति अपनी आस्था के अनुसार श्रद्धा पूर्वक जैसी धर्मिक गतिविधि करके ईश्वरीय अनुभूति प्राप्त कर सके वो वैसा ही करे| इसमें मुझे हस्तक्षेप करने का न तो कोई अधिकार है और न ही कोई औचित्य! पर क्या हम इतना ध्यान रख सकते हैं कि हमारी आस्था से सम्बंधित किसी भी गतिविधि से किसी अन्य कि आस्था को ठेस न पहुचे, किसी अन्य को कोई असुविधा न हो? अगर किसी धार्मिक गतिविधि से दिलो के बीच वैमनस्यता फैलती हो ऐसी धार्मिक गतिविधियों का क्या लाभ? धर्म के बारे में तो हमारे यहाँ ये भी कहा भी जाता है –आत्मन: प्रतिकूलानि परेषाम न समा चारेति! यानि जो व्यवहार आप दूसरो से अपने प्रति नहीं चाहते, वो व्यवहार दूसरों के साथ कभी न करें| अगर हमारे देश का सुप्रीम कोर्ट, जो अक्सर जनहित के मामलों में स्वतः संज्ञान लेकर हस्तक्षेप करता रहता है, काश इस मामले में भी हस्तक्षेप कर सके| ज़रा सोचिये! धर्मनिरपेक्ष भारतवर्ष में क्या ऐसा नहीं हो सकता कि धर्मं को मनुष्य और उस सर्वशक्तिमान के मध्य नितांत व्यक्तिगत विषय मानकर संविधानसम्मत व्यवस्था के माध्यम से उसे घरों, मंदिरों, मस्जिदों, गिरिजाघरों, गुरुद्वारों की दहलीज़ तक सीमित कर दिया जाये और सड़क लोगों चलने के लिए छोड़ दी जाये? लोग पूरे सच्चे मन से अपने घरो में या मंदिर, मस्जिद गिरिजाघर, गुरूद्वारे में, अपने अपने तरीके से पूजा, इबादत, दुआएं, प्रार्थनाये करें! कोई सार्वजनिक प्रदर्शन नहीं! काश! काश ऐसा हो जाये तो धर्म के नाम पर हमें बांटने वाले अधिकांश कथित राजनेताओं की सांप्रदायिक राजनीति को विराम लग जाये| अगर ऐसा हो सके तो मुझे लगता है कि हमारे देश में साम्प्रदायिक दंगे इतिहास मात्र बनकर रह जायेंगे!”
चंदर अपने कल्पना लोक में खोया अपने सूरजभान सर से मुखातिब हो अनवरत बोले जा रहा था! पर अभी उसने ध्यान दिया, उनके और चार छः लोगों के सिवा और कोई वहा सुनने वाला नहीं बचा था, लाला और अन्य लोग एक-एक कर कबके जा चुके थे...सूरजभान जी हतप्रभ से चंदर को देख रहे थे! उसके कंधे पर हाथ रखकर बोले, “चन्दर! तुम सही कह रहे हो शायद! पर तुम उन लोगों के सामने हीरे मोती लुटा रहे हो जो एक तरह की भूंख से परेशान हैं, इन्हें इनकी रोटी चाहिए...तुम्हारा ये दर्शानात्मक व्याख्यान इनके लिए कंकर-पत्थर से अधिक नहीं...”
तभी पुलिस के साईरन कि आवाज़ सुनकर बचे खुचे लोग हडबडाहट में अपने-अपने घर की ओर तेज़ी से जाने लगे| चंदर गुरूजी को प्रणाम कर वहां से चुपचाप... मायूस... हताश घर की तरफ़ चल पड़ा! अपने में ही गुमसुम सा...चंदर! कुछ एक कदम ही तो आगे बढ़ा था गली में, कि सामने से जगदीप, चंदर के कॉलेज का दोस्त, अभी एक प्राइवेट स्कूल में पढाता है, आता हुआ नज़र आया| मज़ाक की मुद्रा में बोल उठा, “अरे चंदर! कहाँ जा रहे हो? हारे हुए खिलाड़ी! काहे, मुंह काहे लटकाए हुए हो? चंदर के मुंह से धीरे से निकला, “ कर्फ्यू” जगदीप हँसते हुए बोला, “हाँ यार बड़ी मुश्किल से एक छुट्टी मिली है...देखो यार! कर्फ्यू दो चार दिन और चल जाये तो मज़ा आ जाये!” चंदर खुले मुंह से उसे ताकता रह गया और वो तेज़ी से कदम भरते हुए सुनसान गली से गायब हो गया| सूनी गली...शून्य में निहारती चंदर की सूनी आँखें... ज़हन में विचारों का कर्फ्यू...
---विजय शुक्ल बादल

Saturday, February 11, 2017

एक मुट्ठी में शाम इक में सहर रखता है।
बिना निग़ाहों के ही सब पे नज़र रखता है।।

वक़्त से सीख लो ऐ दोस्त! बदलने का सबक़,
वक़्त ख़ुद को भी बदलने का हुनर रखता है।।

लोग कहते हैं कि आवाज़ तक नहीं होती, 
उसकी लाठी में वो गज़ब का असर रखता है।।

ऐसे बन्दे पे बरसती हैं बरक़तें उसकी,
ज़हनोदिल में जो उसे आठों पहर रखता है।।

Saturday, May 21, 2016

शिक्षक

शिक्षक कौन है?
वह, जो राष्ट्र के भविष्य (अर्थात बच्चों) के भविष्य का निर्माता है
अथवा वह,जो है असंतुष्ट,
अपने ही वर्तमान से?
वह, जो कभी बनकर रामकृष्ण परमहंस,
उपहार स्वरुप दे देता है,
जगती को विवेकानंद सरीखा व्यक्तित्व?
अथवा वह जो रहता है प्रतीक्षारत, संतुष्ट होने को,
शिक्षक दिवस पर छात्र-छात्राओं द्वारा दिए जाने वाले उपहारों के अभिदान से?
वह, जो कभी बनकर राधकृष्णन, राजकोष में कर देता है आधा वेतन दान?
अथवा वह,
जो लेकर पूरा वेतन
बनता जा रहा है राजकोष पर बोझ,
कर रहा है शिक्षण संहिता का अपमान?
शिक्षक है तो है ऑक्सफोर्ड
जो किसी जंगल में,
कुछ बच्चों के साथ,
चुनता है
ज्ञान की खोज की एक अनवरत यात्रा पर निकलना!
जिसकी बढ़ती प्रसिद्धि के चलते,
जब स्वयं राजा भी चाहता है उससे मिलना,
आर्थिक सहायता का सन्देश देकर भेजता है एक दूत,
किन्तु पाकर यह उत्तर, अस्वीकृति का भी,
हो जाता है अभिभूत,
"मैंने मेरे शिष्यों को कहा है कि ज्ञान होता है सबसे बड़ा!
आएंगे अगर आप, सम्मान में आपके होना होगा मुझे खड़ा,
इसलिए
हृदयतल से
स्वीकृत हैं आपकी सदिच्छाएं और शुभकामनाये,
किन्तु आपसे है निवेदन कृपा कर यहाँ न आएं!"
ऑक्सफोर्ड की अपने शिष्यों के प्रति समर्पण की भावना को देखकर,
होकर नतमस्तक राजा भेजता है यह प्रतिउत्तर,
'जो भगवान् से बड़ा है,
राजा से भी बड़ा रहेगा,
राजा अब आएगा अवश्य पर आपके सम्मान में स्वयं खड़ा रहेगा"
 ये है शिक्षक जो सोच में इतना बड़ा और महान है,
फिर वह कौन है?
जिसे अपनी चारित्रिक मर्यादा तक का न ध्यान है,
शिक्षक क्यों सरकार अथवा प्रबंधसमिति की चिरौरी कर करता रहता है!
तुच्छ व्यक्तिगत लाभों की लालसा में अपने सम्मान की अवहेलना सहता रहता है!
माना की सरकारों/ प्रबंध समितियों में व्याप्त मक्कारी बहुत है,
तुझे भी अपने ढंग से जीने का अधिकार है,
पर रखना ध्यान,
बतौर शिक्षक तुझ पर ज़िम्मेदारी बहुत है...!

दकियानूसी सोंच

ज़माना आज भी वैसा ही है...दकियानूसी सोच जिसे वो पता नहीं किस चिनौटी में दबा के बैठा रहता है... (ज्ञानवर्धक शब्द
चिनौटी अर्थात तम्बाकू रखने की डिबिया😝😝)
लेकिन समाज की ये दकियानूसी सोच आँख कान गला की बीमारिया और कैंसर फ़ैलाने वाली तम्बाकू से भी ज़यादह खतरनाक है...
दरअसल हुआ यूँ कि मेरे यहाँ छुटकू (मेरा भतीजा हर्ष) के मुंडन का प्रीतभोज होना था तो मैंने कहा बुफे (buffet)सिस्टम से खाने की व्यस्था करें...तो कई रिश्तेदारों का मत मेरे मत से असहमत दिखा! गाँव के एक ताऊ कुछ यूँ बोले, "हम का ये गिद्धभोज न समझ आवे... पता नहीं कौन कौन कैसे कैसे खात रहा पिछली बार मुन्ना की बरात मा! हमका तो जमीन पर बिठाल के खिलाओ हाँ! पता नहीं कौन कौन जात का वेटरवा खाना लगावै के खातिर आ जात हैं... हम त न खाब भाई पासी चमार के हाथ का..."
तो मैंने कहा, "ताऊ ये जो शक्कर खाते हो आप पता है आपको? इसको क्या कोई कनौजिया बाजपाई जी आके सूखाते हैं...इसको तो वही...अपने गाँव के हरिजनटोला के सुक्खा, पेरू जैसे मज़दूर भाई ही खम्बारखेरा शुगर मिल में धुप में कभी हाथ कभी पाँव से चला चला के सुखाते हैं...उस शक्कर का तो आप नौरात्र में माँ दुर्गा को बसंदर चढ़ा दिए अब क्याहोगा? देवी नाराज हो जाएँगी अब तो...?"
तो वो फटाक से बोले, "ओकरा पावन ते सक्कर चलावत हम थोड़े ही देखा...""पर ताऊ बिल्ली के आँखे बंद कर लेने से अँधेरा थोड़े हो जाता है, अब तो आपका नवरात्र व्रत टूट ही गया समझो...! ताऊ जी कहाँ आप भी...ज़्यादा पांडित्य खतरे में हो तो ऐसा करेंगे जो पासी चमार वेटर होंगे उनको मोटा मोटा जनेऊ पहना के बड़ा सा तिलक लगा के ले आएंगे फिर तो आपको कोई समस्या नहीं होगी...?" तो बोले, "राम राम ई लड़िका की तउ पढ़ि लिख कई बुद्धि खराब हुइ गयी...राम राम राम राम..." ऐसा कहते हुए वो अपनी चुनौटी से तम्बाकू हथेली पर लेकर मसलते हुए मुझे और नजाने क्या क्या कहते हुए ...आखिर वो चले गए पर अब वो नहीं आएंगे हमारे यहाँ प्रीतिभोज में...उनका जनेऊ हमारे वेटर्स के जनेऊ से पतला जो हो जायेगा न! खैर कहानी ख़त्म! पर बात यहाँ खत्म नही होती, यहीं से शुरू होती है...क्या हरिजन या अन्य नीची जाति के लोग इंसान नहीं? क्या ऊपर वाले ने इनके साथ कोई भेदभाव किया है? सब कुछ वही तो दिया है उसने इन्हें भी जो अन्य जाति के लोगो को दिया तो हम कौन होते है जाति धर्म मजहब केनाम पर भेदभाव फैलाने वाले? सारे भारतीय एक सामान हैं!!!
सोच बदलो, देश बदलो! सब समान हैं, सब इंसान हैं...आओ हम सब समानता के वाहक बनें! जय हिन्द; जय भारत!!!
निवेदक- विजय शुक्ल बादल
9648466384

Tuesday, March 29, 2016

गौरैया

फुदक फुदककर चली आती थी बेख़ौफ़
आँगन में सूखते अनाज में से
चुगने अपने हिस्से के चन्द दाने!
आई है आज भी
फूस की मड़ैया और नीम के पेंड़ की तलाश में,
आखिर हारकर बैठ गयी है,
कंकरीट की फर्श पर रखे गमले में लगे कैक्टस पर!
आज उसकी चहचहाहट में
नहीं है पहले सा संगीत,
नहीं है कीर्तन का सा आभास,
बल्कि है वेदना एक तड़प!!!
शहरी ढांचे के अंधानुकरण से
बँट गए परिवार,
कट गए लोग संस्कारों से,
लुप्त हो गए आँगन!
अब! अति महत्वपूर्ण दिखने के इच्छुक हम प्रदर्शनप्रिय, सुविधाभोगी लोग,
नहीं सुखाते हैं
अनाज छतों पर!
खरीद लेते हैं आंटा-चावल के पैकेट,
गौरैया भूखी है!
नहीं पालते हैं मवेशी
नहीं भरते हैं उनके पीने को कुंडों में पानी,
गौरैया प्यासी है!
कीटनाशकों के प्रयोग ने कीटों को पहले ही किया ख़त्म,
गौरैया उदास है!
अरे! यह क्या?
किस डर से उड़कर भाग चली?
क्या? किसी ने प्यार से किसी बेटी को गौरैया कहा है!!!
गौरैया असुरक्षित है!
गौरैया उपेक्षित है!
गौरिया भूखी है!!
गौरैया प्यासी है!!

गौरैया बचाएं; सृष्टि बचाये!!!
निवेदक
©विजय शुक्ल बादल 9454943854

Tuesday, February 18, 2014